Ganga and Mahadev by Rahi Masoom Raza

Translation: Bhaswati Ghosh

My name sounds like a Muslim’s
Slaughter me and set my home ablaze
Plunder the room where my statements stay awake
Where I whisper to Tulsi’s Ramayana
And say to Kalidasa’s Meghdoot
That I, too, have a message.
My name is like that of Muslims
Kill me and torch my house
But remember that the water of Ganga courses through my veins
Throw a splash of my blood on Mahadev’s face
And say to that yogi — Mahadev
Withdraw this Ganga now
It has sunk into the bodies of the degraded Turks
Where it runs as blood.

गंगा और महादेव
राही मासूम रज़ा

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
मेरे उस कमरे को लूटो जिसमें मेरी बयाने जाग रही हैं
और मैं जिसमें तुलसी की रामायण से सरगोशी करके
कालीदास के मेघदूत से यह कहता हूँ
मेरा भी एक संदेश है।
मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
मुझको कत्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग-रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुँह पर फेंको
और उस योगी से कह दो- महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह ज़लील तुर्कों के बदन में गढ़ा गया
लहू बनकर दौड़ रही है।

Leading Ordinary Lives / Kunwar Narayan

Kunwar Narayan
(Translation mine)

I know
I can’t change the world,
Or win a fight against it.

It’s possible that I
Become a martyr fighting
And beyond that earn a martyr’s
Tomb or an artist’s fame…

But being a martyr
Is a different game altogether

There are people who despite
Leading entirely ordinary lives
Have been known to become
Martyrs, quietly.

मामूली ज़िन्दगी जीते हुए / कुंवर नारायण

जानता हूँ कि मैं
दुनिया को बदल नहीं सकता,
न लड़ कर
उससे जीत ही सकता हूँ

हाँ लड़ते-लड़ते शहीद हो सकता हूँ
और उससे आगे
एक शहीद का मकबरा
या एक अदाकार की तरह मशहूर…

लेकिन शहीद होना
एक बिलकुल फ़र्क तरह का मामला है

बिलकुल मामूली ज़िन्दगी जीते हुए भी
लोग चुपचाप शहीद होते देखे गए हैं

The Crop by Sarveshwar Dayal Saxena

Translation: Bhaswati Ghosh

Even if I were to
hold the pen
like a plow,
a spade
or a trowel,
I wouldn’t be able to
harvest the crop.

I can only prepare the soil.
A few rare ones will sow the seeds of revolution
and nourish my toil,
carrying my journey forward.

Tomorrow, when I’m no longer there,
the crop will grow and flourish,
ripple in the breeze.
My spirit, a flush of golden sunshine
Will touch the feet
of those who planted the seeds
Those who harvest it will sow more seeds
I shall only sleep buried in the earth underneath.

Image result for crop

फसल / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह
पकड़ भी लूँ कलम तो
फिर भी फसल काटने
मिलेगी नहीं हम को ।

हम तो ज़मीन ही तैयार कर पायेंगे
क्रांतिबीज बोने कुछ बिरले ही आयेंगे
हरा-भरा वही करेंगें मेरे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को ।

कल जो भी फसल उगेगी, लहलहाएगी
मेरे ना रहने पर भी
हवा से इठलाएगी
तब मेरी आत्मा सुनहरी धूप बन बरसेगी
जिन्होने बीज बोए थे
उन्हीं के चरण परसेगी
काटेंगे उसे जो फिर वो ही उसे बोएंगे
हम तो कहीं धरती के नीचे दबे सोयेंगे ।